कुछ समय पहले इ-मेल में एक लतीफा पढ़ा था , जिसमे अध्यापक अपने विद्यार्थियों को गरीब आदमी पर निबंध लिखने को बोलती है। एक छोटी लड़की जो की अमीर परिवार से होती है, निबंध कुछ इस तरह लिखती है - गरीब वो होता है, जिसका ड्राईवर गरीब हो, जिसकी आया गरीब हो, जिसका माली भी गरीब हो, जिसके पास २ BMW, 2 Merc, 2 Porsche की जगह ये गाड़ियाँ सिर्फ १-१ ही हो।
इसी को सोचकर मेरे दिमाग ने सोचा कि सिर्फ वो आदमी ही गरीब क्यों है? एक इंसान (पढ़े योगेश) जिसकी तनख्वाह ४० हज़ार से कम है और उसके ऊपर ३ क्रेडिट कार्ड के बिल हैं जिनका कुल योग 34 हज़ार है, उसके ऊपर दोस्तों से लिए गए उधार के 20 हज़ार बकाया है, घर का किराया और अन्य घर खर्च मिलाकर 15 हज़ार हैं। और इन सबसे बढ़कर उसने अपने भूतकाल में जो भविष्य को सुखद बनाने के लिए पोलिसियाँ ली थीं उनके 18 हज़ार भी तो देने हैं। इस बेचारे आदमी को गरीब न कहे तो क्या कहे।( ध्यान रहे इन सब खर्चो में रोज़ मर्रा के होने वाले खर्च शामिल नहीं किये गए हैं, जैसे कि चलचित्र देखना, पेट्रोल खर्च, दूरभाष पर होने वाला खर्च इत्यादि) और दुनिया बोलती है IT अभियंता बहुत अमीर होते हैं।
कोई है जो इसे गरीबी रेखा से नीचे जीने वाला प्रमाण पत्र दिलवा दे ? नहीं तो कोई दयावान आकर अपनी दया कि कुछ मुद्रा इसके ऊपर लुटा दे ?
Tuesday, January 5, 2010
Thursday, September 3, 2009
बजट की घोषणा और मार्केट की प्रतिक्रिया
६ जुलाई को शेयर मार्केट अचानक से बहुत तेज़ी से लुढ़क गया जैसे ही हमारे वित्त मंत्री ने बजट पेश किया। मार्केट ८६९ अंक नीचे जाकर धूल चाटने लगा । यह अब तक का बजट के दिन होने वाला सबसे बड़ा पतन था। शुरू से ही ऐसा होता आया है कि मार्केट बजट पर तुंरत अपनी प्रतिक्रिया दे देता है, लेकिन ऐसा क्यों? बजट की भाषा और दस्तावेज बहुत ही जटिल होते हैं, निःसंदेह विशेषज्ञ भी उस पर अपनी राय देने में समय लगाते हैं। और हमारे प्रिय शेयर तुंरत नीचे ऊपर हो जाते हैं। कुछ तरीके जो की अपनाए जा सकते हैं , इस प्रकार की मुश्किल घड़ी के लिए -
- सरकार को मार्केट और आम जनता को बताना होगा की बजट लोक नीतियों की घोषणा करने का मंच नही है, जो की आर्थिक सुधार से सम्बंधित हों।
- कुछ समय पहले ही हमारे देश के सबसे बड़े बैंक (रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ) ने तय किया कि वो मोद्रिक कार्यवाही से सम्बंधित सूचनाओ (जैसे कि सीआरआर, एससीआर, रेपो दर) को नीतिगत घोषणाओसे हटा कर उन्हें वर्ष में ४ बार घोषित करेंगी जो कि वो पहले अर्धवार्षिक करती थी। जल्दी जल्दी घोषणाएं होने से बाज़ार का रुख मोद्रिक नीतियों कि तरफ़ कम हो जाता है। तो ऐसी ही व्यवस्थता बजट के समय लागू करनी चाहिए।
- विनिवेश (Disinvestment) और सीधा विदेशी निवेश (Foreign direct Investment) घोषणाएं पहले से ही पुनः स्थापित होनी चाहिए ताकि मार्केट को प्रतिक्रिया का यथेस्ट समय मिल सके |
- शेयर मार्केट को समझना चाहिए की विनिवेश कोई तुंरत होने वाली क्रिया नहीं है. राजनीतिक इच्छा के अलावा साझेदार, प्रबंधकर्ता (regulator) की स्वीकृति समय लेती है |
- अभी की केंद्रीय सरकार पिछले वाले कार्यकाल की सरकार से ज्यादा स्थिर है और सहयोगी पार्टियाँ भी सुधार के विरोधी नहीं हैं |
- इस वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण ने अपेक्षा की रेखा को और ऊंचा उठा दिया| इसके अनुसार विनिवेश के लिए काफी बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया था |
- सर्वेक्षण बजट के आस पास ही आया और बजट में सुधार की घोषणाओ को कठिन बना दिया|
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